संसद की बहस में गिरावट: लोकतंत्र पर सवाल
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संसद में बहसों की गुणवत्ता और आवृत्ति घट रही है - अधिकांश बिल बिना समिति समीक्षा के ही पास हो रहे हैं। इससे विपक्ष और विशेषज्ञों के महत्वपूर्ण फीडबैक का मौका घट रहा है और कार्यकारी निर्णय पर निर्भरता बढ़ रही है। यह बदलाव संसद को सार्वजनिक जवाबदेही और नीति समीक्षा के मंच के रूप में अपनी प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा कर रहा है।
ख़ास क्यों
संसद की निगरानी कम होने से कानूनों का खराब रूपांतरण संभव है, जो हर भारतीय नागरिक और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा।
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