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अदालतों में आज भी हावी पितृसत्तात्मक सोच, बलात्कार पीड़ितों के चरित्र पर उठ रहे सवाल

· India · Indian Express, LiveMint

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय अदालतों में बलात्कार पीड़ितों के आकलन पर आज भी पितृसत्तात्मक सोच का असर है। इससे आरोपी के कृत्यों के बजाय पीड़िता के चरित्र पर जांच केंद्रित हो जाती है। तरुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले के बाद यह बहस तेज हुई है, जिसमें 'आदर्श पीड़ित' की धारणा को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को पलट दिया गया था। वकील वृंदा ग्रोवर ने बताया कि साल 2013 के कानूनी संशोधनों में सहमति की स्पष्ट परिभाषा तय होने के बावजूद अदालतें महिलाओं की व्यक्तिगत स्वायत्तता को समझने में संघर्ष कर रही हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि न्यायिक असंवेदनशीलता अक्सर लैंगिक भूमिकाओं और आघात पर पीड़ितों की प्रतिक्रिया को लेकर पूर्वाग्रहों से जुड़ी होती है।

ख़ास क्यों

बलात्कार पीड़ितों की न्यायिक जांच से ट्रायल के नतीजों पर असर पड़ता है और देश की अदालतों में यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई की दिशा तय होती है।

मूल ख़बर पढ़ें — Indian Express

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